ज्यादातर समय आप उलझे हुए हो खुद में, क्यों ऐसा है ? ऐसा इसलिए है कि हमारा मस्तिष्क शांत नहीं रह सकता , इसकी बनावट ही ऐसी है की हर वक़्त इसे कहीं न कहीं लगा होना चाहिए और अगर ऐसा नहीं है तो वह परेशान हो जाता है और बेवजह के सपने देखना शुरू कर देता है जिन्हे हम "daydreaming" अथवा दिन में स्वप्न देखना भी कहते है , मगर ऐसा नहीं है की इस कार्य के सारे फल झूठे है , अक्सर हम बच्चों को इस कार्य में लगा हुआ देखते है क्योंकि उनका आकाश खुला हुआ होता है जो की पूर्णतः विपरीत है जब हम बड़े हो जाते है और हमे जिम्मेदारियाँ घेर लेती है। माता पिता बच्चों को अक्सर डाँटते भी है इसलिए इस क्रिया की बहुत नकारात्मक छवि है हमारे समाज में , मगर बड़े होने पर इस क्रिया की बहुत सख्त ज़रुरत पड़ती है और यह हमे तब पता चलता है। असलियत क्या है यह तो हर व्यक्ति की अपनी अपनी राय है , मगर सच यही है की इस क्रिया की कमीं के कारण हम बाजार में सामान वस्तुएँ और उनको बेचने के सामान तरीके देखने को मिलते है। असलियत खोती जा रही है और नक़ल हावी है हमारे दिमाग पर , जो चलन में है उसी को एक नए रूप में पेश करना सबसे आसान रास्...
Reading and writing are like day and night, travelling simultaneously inside us