परिणाम है कर्म का ,उदित हुआ सूर्य मेरा सच - झूठ , सब डूब गया , वक़्त के साथ मेरा है यही सत्य तो सही , पर गलत कुछ है नहीं करे जन आक्रोश का तमाशा , रुक भी जाओ रात मेरी आग के फलक के साथ नाचेगी रात मेरी , बस यही है सत्य मेरा , बस यही है झूठ मेरा। कुछ कमीं नहीं थी उस जगह पर अनजाना लगता था महीनो बीते फिर भी बेगाना सा लगता था हूँ वहीं का निवासी , मौत जिसके घर की दासी यम जिसके घर का राजा , क्रोध जिसका पालक है शांति शत्रु है उसकी , लालच उसका सेवक है ईर्ष्या राज करती है वहां , आलस दिन बीताता है सपने धोये जाते हों निराशा के बूंदों से , अकर्मण्यता का विश्वासी हर पहर तुम्हारे दुश्मनों का साथी , असभ्य व्यव्यहार है अपनों से न वो मानता उनको अपना , न वो लगते है कुछ अपने से ...
Reading and writing are like day and night, travelling simultaneously inside us